प्रकृति की पुकार
> हरियाली की चादर ओढ़े, धरती मुस्कान लुटाए ।
नीला अम्बर, ठंडी बयारें, मन को अच्छे गीत सुनाए।।
पत्तों की सरसराहट में ,कुछ मीठे राज छुपे हैं ।
हर शाख़ और कली में, जीवन के अंदाज़ छुपे हैं।।
नदियाँ बोलें, झरने गाएँ, पर्वत करते ध्यान,।
जैसे सृष्टि खुद रचती हो, कोई मधुर रसगान।।
पंछी चहकें, फूल महकें, बगिया बहे बहार।
प्रकृति का ये उपहार हमें, मिलता बारम्बार।।
पर हम हैं कि भूल गए हैं, इस सुंदर संसार को।
काट रहे हैं पेड़ जहाँ-तहाँ, कर रहे हैं उजाड़ को।।
धुएँ में घुटती साँसें अब, कहती हैं साफ़-साफ़,।
"अब भी सम्भल जा मानव, वरना होगा महाविनाश"।।
चलो उठाएं एक कदम, फिर से हरियाली लाने को।
धरती माँ के आँचल में, फिर से रंग सजाने को।।
एक पौधा हर मौके पर, ये संकल्प निभाएँ,।
प्रकृति के हर कण में फिर, जीवन गीत सुनाएँ।।

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