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प्रकृति की पुकार

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> हरियाली की चादर ओढ़े, धरती मुस्कान लुटाए । नीला अम्बर, ठंडी बयारें, मन को अच्छे  गीत सुनाए।। पत्तों की सरसराहट में ,कुछ मीठे राज छुपे हैं । हर शाख़ और कली में, जीवन के अंदाज़ छुपे हैं।। नदियाँ बोलें, झरने गाएँ, पर्वत करते ध्यान,। जैसे सृष्टि खुद रचती हो, कोई मधुर  रसगान।। पंछी चहकें, फूल महकें, बगिया बहे बहार। प्रकृति का ये उपहार हमें, मिलता बारम्बार।। पर हम हैं कि भूल गए हैं, इस सुंदर संसार को। काट रहे हैं पेड़ जहाँ-तहाँ, कर रहे हैं उजाड़ को।। धुएँ में घुटती साँसें अब, कहती हैं साफ़-साफ़,। "अब भी सम्भल जा मानव, वरना होगा महाविनाश"।। चलो उठाएं एक कदम, फिर से हरियाली लाने को। धरती माँ के आँचल में, फिर से रंग सजाने को।। एक पौधा हर मौके पर, ये संकल्प निभाएँ,। प्रकृति के हर कण में फिर, जीवन गीत सुनाएँ।।

जंगल पुकारे मुझे बचा लो।

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 जेसीबी से जंगल कट रहे , रोक सको तो रोक लो । कल का हाल बुरा होने वाला है, ये बात सबके मन में ठोक लो ।। कोयल ,मोर कबूतर रोवे, रो रहा है जंगली शेर। ऐसे ही कटते रहे जंगल, तो सभी को होना है ढेर।। जंगल  में हड़ताल है , लेकिन मानव  कब जागेगा । देर हो चुकी होगी , फिर जंगल बचाने भागेगा ।। आज जिसको जी रहे , कल ना मिलेगा मौका।   आने वाली पीढ़ी को हम, सब दे रहे हैं धोखा ।। आज विकास के नाम पर , प्रकृति का परिहास किया।। जन्म मिला है लेकिन ,हमने इसको  पूरा  नहीं जीया।। समय है उठ खड़ा हो  ओर ,जंगल को बचाने कब आओगे। पूछेंगे आपके   बच्चे  फिर ,उनसे आंख न मिला पाओगे ।।  प्रतिज्ञा लो कि पेड़ ना काटेंगे, और काटने  वाले को टोकेंगे । हर हाल में किसी भी खुशी के मौके पर, एक पौधा जरूर रोपेंगे ।।