संदेश

बरसात री ऊंची लहर

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कुंभार रो चाक रुक गयो, बढ़ई रो औजार भीगे । माई रो चूल्हो ठंडो पड़ी गयो, घर में लकड़ियां भी सीले।। चौपाल सूनी, पनघट सूना, मेल-मिलाप में दूरी । बरसात में रीझ्यो अम्बर, पर गांव में छाई मजबूरी।। भूख री चिंता, छप्पर में आवे टपक । बालकां री आँखां में सपनां धपक।। बरसात री आई घणी ऊंची  लाई लहर। घूंघट में घेर्यो  थारो अम्बर  भीग गयो थारो शहर।। बूंदां बरसी झूम-झूम  के , होवे धरती री छाती गीली । नदी नालों में पानी भर  गीयों, आवे झरना की आवाज सुरीली।। सारी बावड़ियां  भरगी , नदियाँ आवे उफाण। गामां में चाल्य रहो , पानी रो तूफान।। घरां में घुस्यो पानी रा पग,रखवा की जगह कठे। थर-थर कांपै घर री दीवार, सुखा कपड़ा नहीं मिले अठे।। खेता में बिजया बीज बहग्या,हलवारों री मेहनत  बहगी। खेत हो गया लबालब , अब खाई खेती हेगी।। पग-पग में है नीर, रस्ता  होवे  कीच । चालणो होरीहो  है मुस्कल,  अब जीवन कु खींच।। म्हारा बालक स्कूल ना जावै,कलेक्टर साहब ने कर दीनी छुट्टी। म्हारी आंखा ने नजर  न आवे, दूर दूर तक मिट्टी।। रामजी! थोड़ो रोको , संतुलन बनाके राखजो । धरती ने ...

आतंकी ठिकानों को किया नष्ट

साल था दो हज़ार पच्चीस, धरती फिर से कांपी थी। सीमा पर फिर शोर उठा था,  पाकिस्तान की सरहद  थी। गोलियाँ फिर बोल रही थीं, तोपों का सुर गूंजा था। दो मुल्कों की जिद में फँसकर, एक और बचपन टूटा था। ड्रोन उड़ते, मिसाइलें गिरतीं, टेलीविजन पर शौर था। पर माओं की आँखों में बस, चुप्पी का ही जोर था। किसे दोष दें, किसे समझाएँ, जिन्हें कुर्सी प्यारी थी। उनके एक आदेश भर से, हजारों चिताएँ सारी थीं। कश्मीर फिर बहा खून में, सिंधु नदी भी सुबक पड़ी। सरहद के दोनों ओर की, हर रूह जरा-जरा सी जली। क्या यही है गर्व का चेहरा? क्या यही है विजय का रंग? जहाँ सिपाही की जय पर भी, बजते हैं रुदन के संग। शायद अब समय यही कहता— "मंज़र बदलो, मत गिन घाव। युद्ध नहीं, अब चाहो सुलह, दोस्ती का भरोसा पाओ।" --- अगर आप चाहें तो इस कविता को एक गाने या स्क्रिप्ट के रूप में भी ढाला जा सकता है। क्या आप इसमें कुछ और जोड़ना चाहेंगे – जै से एक सैनिक की कहानी या नागरिकों की दृष्टि?

भागती ज़िंदगी

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हर सुबह की घंटी जैसे जंग का किया है ऐलान । नींद को कुर्बान कर,  काम पर चलता है  इंसान।। कदम दर कदम, बस  ढूंढे मंज़िल की तलाश । सांसें भी थकें, पर दिल कहे — "और कर प्रयास ।। कॉफ़ी की चुस्की में  ढूंढता है सुकून की तलाश । लंबी ट्रैफिक की भीड़ में, खोता है विश्वास।। फाइलों के ढेर में, दबे  रह गए हैं ख्वाब । इन मुस्कराते चेहरों के पीछे, छुपे  हुए है  जवाब।। फोन की बज रही  घंटियाँ, ओर  मीटिंग का शोर । रिश्ते भी अब लगने लगे है , हो कोई कोरपोरट डोर।। वक़्त के पीछे भाग रहे ,निकल रहे  हैं दिन-रात।  भागदौड़ में खुद से ही खुद की ,नहीं हो पाती बात ।। कभी ठहर के देखो,  और ज़रा  साँस लो । ज़िंदगी की किताब में ,  कुछ पन्ने तो खोलो। हर लम्हा कीमती है, यू  मत इसको  गंवाओ । इस भागदौड़ की जिंदगी में , खुद को मत खो जाओ।। अपनो के लिए भी समय निकाल कर दिया करो । दो कप चाय शांति से , उनके साथ पिया करो ।।

बाबा साहेब भीमराव पर कविता

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  शेरनी को दूध शिक्षा ,  पढ़वाडो ही दहाडेगो । पापी पाखंडी को पाखंड उतारेगो।। हा भीमराव का गुण गाओ ,शिक्षा की आगी बंदी में । नही तो मार कचाटो ,धूब खोदती नंदी में ।। अब नमन करो बाबा भीमराव कु ,रच दिया भारत को संविधान। और पिछड़ों को अधिकार दिलाया , दलितों को सम्मान।। भीमराव का गुण............. तेने शिक्षा को अधिकार दिलाओ , बणगा ने अधिकारी ।  और स्वतंत्रता का जीवन जीती, मेरे वतन की नारी ।।  अब (भई)मानवता का पाठ पढ़ाया ,दिलाया मौलिक तो अधिकार । बाबा साहब थारी घर घर में तो, हो रही जय जय कार।। जय भीम तो बोलो, या भारत को भाग्य विधाता रे। बच्चा बच्चा भी, तेरे ही गुण गाता रे।। जैसे पवित्र गीता और कुरान, वतन का लिखती एक विधान। सारी तकलीफो का समाधान, राष्ट्र अखंडता का बखान।। एकता की इसमें पहचान ,हर भारतवासी का मान सम्मान। यही प्रार्थना और अजान ,याको दुनिया करे गुणगान।। दे दिया अधिकारों का वरदान, धर्मनिरपेक्षता का संघान।। अरे धर्मनिरपेक्षता का संबान। निर्माण में 12 समितियों का अवदान।। अब (भई )2 साल 11 महीने 18 दिन में ,बनगो ने सुजान।  और नमन करो बाबा भीमराव कु ,रच द...

प्रकृति की पुकार

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> हरियाली की चादर ओढ़े, धरती मुस्कान लुटाए । नीला अम्बर, ठंडी बयारें, मन को अच्छे  गीत सुनाए।। पत्तों की सरसराहट में ,कुछ मीठे राज छुपे हैं । हर शाख़ और कली में, जीवन के अंदाज़ छुपे हैं।। नदियाँ बोलें, झरने गाएँ, पर्वत करते ध्यान,। जैसे सृष्टि खुद रचती हो, कोई मधुर  रसगान।। पंछी चहकें, फूल महकें, बगिया बहे बहार। प्रकृति का ये उपहार हमें, मिलता बारम्बार।। पर हम हैं कि भूल गए हैं, इस सुंदर संसार को। काट रहे हैं पेड़ जहाँ-तहाँ, कर रहे हैं उजाड़ को।। धुएँ में घुटती साँसें अब, कहती हैं साफ़-साफ़,। "अब भी सम्भल जा मानव, वरना होगा महाविनाश"।। चलो उठाएं एक कदम, फिर से हरियाली लाने को। धरती माँ के आँचल में, फिर से रंग सजाने को।। एक पौधा हर मौके पर, ये संकल्प निभाएँ,। प्रकृति के हर कण में फिर, जीवन गीत सुनाएँ।।

पिता जी याद में कविता

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छांव थे वो धूप में, साया थे सर्दी की रातों में । सुनकर भी डॉट पापा की , मजा आता था उनकी बातों में ।। बिना कहे जो सब समझते, नजरों से पढ़ लेते हाल चाल। खुद रह गए अधूरे पर, पर हमें  कर गए मालामाल ।। मिला उनका हमे आशीर्वाद , जैसे हो भगवान का हाथ है।  जब नहीं हैं हमारे बीच में ,  कुछ छूट गया हमारा  साथ है ।। जो डांट में भी प्यार था , वो अब  समझ में आ गई ।, ऐसी बीमारी ने जकड़ लिए , जो पिताजी को खा  गई । हर कदम पर याद आते , सलाहों और दुआओं में,। हमेशा ज़िंदा रहेंगे वो, हमारी सांसों और दास्तानों में।। लिखता हूं आपके बारे में ,तो आंखों से पानी आ रहा । रोज कर कर के याद , आपके न होने का अहसास सता रहा।।   नजदीक से देखी अमीरी  हमने, आपके ही राज में । कभी मांग लो पैसा , नहीं रुकने दिया कोई काज में ।। याद आपकी जब भी आवे , चेहरा सिर्फ  खिलता  रहा। जब भी अटका कही पर भी , आपका आशीर्वाद मिलता रहा ।। आपके चरणों में  सदा मेरा नमन ।।

जंगल पुकारे मुझे बचा लो।

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 जेसीबी से जंगल कट रहे , रोक सको तो रोक लो । कल का हाल बुरा होने वाला है, ये बात सबके मन में ठोक लो ।। कोयल ,मोर कबूतर रोवे, रो रहा है जंगली शेर। ऐसे ही कटते रहे जंगल, तो सभी को होना है ढेर।। जंगल  में हड़ताल है , लेकिन मानव  कब जागेगा । देर हो चुकी होगी , फिर जंगल बचाने भागेगा ।। आज जिसको जी रहे , कल ना मिलेगा मौका।   आने वाली पीढ़ी को हम, सब दे रहे हैं धोखा ।। आज विकास के नाम पर , प्रकृति का परिहास किया।। जन्म मिला है लेकिन ,हमने इसको  पूरा  नहीं जीया।। समय है उठ खड़ा हो  ओर ,जंगल को बचाने कब आओगे। पूछेंगे आपके   बच्चे  फिर ,उनसे आंख न मिला पाओगे ।।  प्रतिज्ञा लो कि पेड़ ना काटेंगे, और काटने  वाले को टोकेंगे । हर हाल में किसी भी खुशी के मौके पर, एक पौधा जरूर रोपेंगे ।।

चेतराम की शादी की सालगिरह की हार्दिक बधाई हो

 गांव तेरा है गुणेश्रा, नाम है चेतराम । जेएन के पद पर थर्मल में ,कर रहा हैं काम।। करौली तेरी तहसील है , और जिला मुख्यालय है पास । बचपन में भारी भेस चराई, सिर पर लावयों घास ।। गरकान का गुण गाओ , शिक्षा का रास्ता दिखाओ रे। नहीं तो टैक्टर ट्रॉली भर भर कर लेते आतो रे ।। याने करी पढ़ाई कौटिल्य में , इलेक्ट्रिकल विषय चुना । डिग्री होते ही आगी वेकेंसी , इसने इस अवसर को लिया भुना ।। दिन रात मेहनत करी, जब जाके जेएन को पास किया । थारा भाई ने कविता लिख कर के , सबको सरप्राईज दिया ।। मिली पोस्टिंग छाबड़ा में , नौकरी का भारी मजा लिया । रोज खेलते थे तास रात कु, सबके लिए दरवाजा खुला किया ।। ह रे छोरी चाहिए नौकर , फेरा को पाडू पड़वाड़ी सु । दोनू तन्खा लावे ,सूते नोट दाताडी सु।।  झालावाड़ सु चर्चा चल रही चेतराम होशो होशो डोले रे। मटा बगल में से बचकर जावे, मोड़या सु नहीं बोले रे।। जब फ़िक्स हो गई सगाई, अंगूर के रस गालन पे लगा रहा । याके रूम पार्टनर की लग गई मौज, अब तो रोज अंगूर खिला रहा।। 20 अप्रैल की डेट निकली , फुर्सत नहीं हमसे बात करवा की । लगो रहवेओ फोनन पे दिन रात , फुर्सत नहीं रोटी कर...

Corona महामारी पर कविता

Corona महामारी के लिए एक संदेश कविता के माध्यम से .............. Corona महामारी चला चीन से ,सब देशन में आ गई। स्पेन  इटली अमेरिका और भारत में भी छा गई ।। चीन देश से हुई शुरुआत ,या बेकार अाई महामारी । सब ने लगाओ लॉकडाउन , मच रही हाहाकारी।। जब 30 जनवरी को भारत में ,आयो पहला केस। पब्लिक विदेश से आ रही , धर Corona  का भेष ।। बीमारी विदेश से आए रही , हम हो रहे थे बैचेन। काश थोड़ी पहले जागते ,लगाते फ्लाइटन पे वेन।। भारत में ऐसा करने से ,तस्वीर कुछ और ही होती ।  पब्लिक बिना  महामारी के , खुले आसमान में सोती ।। Corona महामारी की पहचान, दूखे सिर साची ।  आबे सास लेने में दिक्कत ,और साथ में उठे सूखी खांसी ।। टच की ह बीमारी , एक से दूजे में आए । उठे जब छिक, मुंह पे मास्क लगाए।। ठंडा पानी छोड़ के ज्यादा से ज्यादा गर्म  पानी का सेवन करे। देना इतनी शक्ति देना प्रभु सबको,जिससे इस बीमारी से बिल्कुल ना डरे।। एक नहीं दो मीटर की दूरी रखो ,बात करो जब दूजा से। किसी के चक्कर में मत पड़ना, मिटेगी नहीं जादू टोना और पूजा से ।। एक दूसरे को खयाल रखो , Corona महा...