बरसात री ऊंची लहर
कुंभार रो चाक रुक गयो, बढ़ई रो औजार भीगे । माई रो चूल्हो ठंडो पड़ी गयो, घर में लकड़ियां भी सीले।। चौपाल सूनी, पनघट सूना, मेल-मिलाप में दूरी । बरसात में रीझ्यो अम्बर, पर गांव में छाई मजबूरी।। भूख री चिंता, छप्पर में आवे टपक । बालकां री आँखां में सपनां धपक।। बरसात री आई घणी ऊंची लाई लहर। घूंघट में घेर्यो थारो अम्बर भीग गयो थारो शहर।। बूंदां बरसी झूम-झूम के , होवे धरती री छाती गीली । नदी नालों में पानी भर गीयों, आवे झरना की आवाज सुरीली।। सारी बावड़ियां भरगी , नदियाँ आवे उफाण। गामां में चाल्य रहो , पानी रो तूफान।। घरां में घुस्यो पानी रा पग,रखवा की जगह कठे। थर-थर कांपै घर री दीवार, सुखा कपड़ा नहीं मिले अठे।। खेता में बिजया बीज बहग्या,हलवारों री मेहनत बहगी। खेत हो गया लबालब , अब खाई खेती हेगी।। पग-पग में है नीर, रस्ता होवे कीच । चालणो होरीहो है मुस्कल, अब जीवन कु खींच।। म्हारा बालक स्कूल ना जावै,कलेक्टर साहब ने कर दीनी छुट्टी। म्हारी आंखा ने नजर न आवे, दूर दूर तक मिट्टी।। रामजी! थोड़ो रोको , संतुलन बनाके राखजो । धरती ने ...