आतंकी ठिकानों को किया नष्ट
साल था दो हज़ार पच्चीस,
धरती फिर से कांपी थी।
सीमा पर फिर शोर उठा था,
पाकिस्तान की सरहद थी।
गोलियाँ फिर बोल रही थीं,
तोपों का सुर गूंजा था।
दो मुल्कों की जिद में फँसकर,
एक और बचपन टूटा था।
ड्रोन उड़ते, मिसाइलें गिरतीं,
टेलीविजन पर शौर था।
पर माओं की आँखों में बस,
चुप्पी का ही जोर था।
किसे दोष दें, किसे समझाएँ,
जिन्हें कुर्सी प्यारी थी।
उनके एक आदेश भर से,
हजारों चिताएँ सारी थीं।
कश्मीर फिर बहा खून में,
सिंधु नदी भी सुबक पड़ी।
सरहद के दोनों ओर की,
हर रूह जरा-जरा सी जली।
क्या यही है गर्व का चेहरा?
क्या यही है विजय का रंग?
जहाँ सिपाही की जय पर भी,
बजते हैं रुदन के संग।
शायद अब समय यही कहता—
"मंज़र बदलो, मत गिन घाव।
युद्ध नहीं, अब चाहो सुलह,
दोस्ती का भरोसा पाओ।"
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अगर आप चाहें तो इस कविता को एक गाने या स्क्रिप्ट के रूप में भी ढाला जा सकता है। क्या आप इसमें कुछ और जोड़ना चाहेंगे – जै
से एक सैनिक की कहानी या नागरिकों की दृष्टि?
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